लेखक – इंजीनियर भुवनेश कपूर
सिविल इंजिनियरिंग और स्थापत्य कला, विज्ञान का वह क्षेत्र है जो मानव जीवन की आवश्यकता और सुविधाओं के लिए भवन, वाणिज्य, यातायात संबंधी स्थापत्य की रचना एवं निर्माण को पूरा करने का कार्य करता है । यह विज्ञान व्यक्ती से लेकर पूरे समाज और राष्ट्र को प्रभावित करता है ।
हर शताब्दी, काल और युग में इसकी छाप स्पष्ट तौर पर देखी गई है । यहां तक की अलग – अलग स्थान या सभ्यताओं के मानव कृत स्थापत्य से हम वहाँ के लोगों के जीवन की सुख सुविधा, उनकी कुशलता एवं वैभव का अनुमान भी लगाते हैं ।
जब आप विकसित क्षेत्र के प्रांगण में होते हैं और अविकसित क्षेत्र में होते हैं तो दोनों क्षेत्रों की सुविधा और कठिनाइयों का अंतर स्पष्ट अनुभव होता है । विकसित क्षेत्र के योजनाबद्ध तरीक़े से बने रास्ते, भव्य दिखने वाले भवन और उनकी आकार्षक वास्तुकला एवं सुविधाएं हमें अच्छा अहसास कराती हैं ।
जिस प्रकार मानव शरीर के विभिन्न अन्दरूनी अंग सुचारु रूप से जब तक कार्य करते रहते हैं तब तक उनकी उपस्थिति का अनुभव नहीं होता लेकिन जब कोई गड़बड़ होती है जैसे पेट ख़राब होना तब उनकी उपस्थिति का अहसास होता है और उन अंगों के स्वस्थ रहने का महत्त्व भी पता चलता है, इसी प्रकार इन्फ़्रास्ट्रक्चर के विभिन्न अंगों की स्पष्ट उपस्थिति का आभास ना होने पर भी वह कार्य करते रहते हैं और समाज सेवा में लगे हैं।
पेय जल की पाईपलाइन प्रणाली से पहले लोग जल आवश्यकता के लिए किसी जल स्तोत्र जैसे नदी के आसपास रहते थे या फिर कुएं बनाकर जल आपूर्ती की जाती थी लेकिन आज की ‘नल से जल’ की सुविधा की बात ही अलग है । दूसरी ओर शौच की सुविधा भी दुर्गम और कई स्थानों पर असुविधाजनक होती थी परन्तु पाईपलाइन द्वारा आज के समय में घर के बने बाथरूम से ही मल निकासी, स्वच्छता पूर्वक हो जाती है और आज यह सब हमें बहुत साधारण सी बात लगती है , पुराने समय की तरह हम इन सुविधाओं के लिए परेशान नहीं होते ।
पिछले 300 वर्षों में मकैनिकल एवं इलैक्ट्रिकल यांत्रिकी के क्षेत्रों में वैज्ञानिक विकास और इन सभी क्षेत्रों की तकनीकों का आपस में काम करना आज के समाज को नये आयाम में ले आया है ।
उदहारण के लिए सन् 1800 से पहले यातायात के लिए राजमार्ग (हाईवे), रेलमार्ग उपलब्ध नहीं थे तब कुछ सौ किलोमीटर के यातायात जैसे दिल्ली से जयपुर के बीच की 300 किलोमीटर की दूरी तय करने में कईं दिन लग जाते थे परन्तु राजमार्ग, रेलमार्ग और वाहन तकनीकी के विकास के बाद आज यही दूरी 6 घंटे में तय की जा सकती है ।
पिछले 100 वर्षों में इंजिनियरों ने घर, कारखाने, बाज़ार की योजना और निर्माण को नए पदार्थों के मिश्रण से किया है जिससे भवन कई गुना बड़े आकार के हो गए हैं और हर तरह की प्राकृतिक हलचल जैसे की भूकंप, तूफान को झेलते हुए आपको आवास, कार्य करने के स्थान और कई अन्य सुविधाएं प्रदान करते हैं । इंजिनियर्स के यह निर्माण भारत और विश्व को ऐसी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं जो हज़ारों वर्षों से नहीं देखी गईं, सिविल इंजीनियरों द्वारा रचित भवन और लोक स्थापत्य भारत की 140 करोड़ की जनसंख्या की सेवा कर रहे हैं और राष्ट्र का गौरव बढ़ा रहे हैं ।
